अनंत श्री विभूषित यति चक्र चूड़ामणि – स्वामी करपात्री जी महाराज
जीवन-पथ

अनंत श्री विभूषित यति चक्र चूड़ामणि स्वामी करपात्री जी महाराज

स्वामी करपात्री जी महाराज (1907–1982) – अद्वैत वेदांत के महान प्रचारक, धर्म सम्राट, यति चक्र चूड़ामणि और भारतीय सनातन परंपरा के अनमोल रत्न। उनके जीवन, साधना और सामाजिक योगदान ने धर्म, शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में अपार प्रभाव डाला।

1907–1982
उत्तर प्रदेश, भारत

धर्मसम्राट, योगी, विद्वान
अनंत श्री विभूषित यति चक्र चूड़ामणि

जन्म एवं बाल्यकाल

स्वामी करपात्री जी महाराज का जन्म 1907 ई. में उत्तर प्रदेश के भटनी गाँव में हुआ। उनका जन्म नाम हरि नारायण ओझा था। बचपन से ही उनमें तीव्र स्मरण शक्ति, धार्मिक प्रवृत्ति और वैराग्य दिखाई देने लगी। बार-बार घर छोड़कर वे साधु-संतों के संग रहने लगे।

साधना और संन्यास

  • नौ वर्ष की आयु में घर छोड़कर बनारस में संन्यास लिया।
  • स्वामी विशुद्धानंद जी महाराज से दीक्षा प्राप्त और 'करपात्री' नाम प्राप्त किया।
  • दीर्घ तपस्या, वेदाध्ययन, उपनिषद, दर्शन, न्याय-मीमांसा और धर्मशास्त्र का अध्ययन किया।
  • भिक्षा हाथ की हथेली पर स्वीकार करने की आदत से 'करपात्री' नाम पड़ा।

दर्शन और विचारधारा

स्वामी करपात्री जी महाराज अद्वैत वेदांत के प्रखर प्रचारक थे। उनका मानना था कि धर्म और राजनीति अलग नहीं हैं। उन्होंने 'धर्मो रक्षति रक्षितः' के सिद्धांत पर धर्म की रक्षा हेतु अनेक आंदोलन किए। वे वैदिक धर्म, वेदांत और सनातन परंपरा को सरल और व्यवहारिक रूप में प्रस्तुत करते थे।

सामाजिक और धार्मिक योगदान

  • धर्म संघ की स्थापना – सनातन धर्म की रक्षा और प्रचार के लिए।
  • राम राज्य परिषद – रामराज्य स्थापित करने हेतु।
  • गौहत्या निषेध आंदोलन का नेतृत्व।
  • भारतीय संस्कृति, गीता, वेद और धर्मशास्त्र पर प्रवचन।

रचनाएँ और साहित्यिक योगदान

  • मार्क्सवाद और रामराज्य
  • वैदिक संस्कृति के मौलिक तत्व
  • धर्म संकट
  • वेदान्त प्रकाश
  • गीता प्रकाश
  • गो रक्षा महायज्ञ
  • अन्य ग्रंथ, निबंध और प्रवचन संग्रह

समाधि और सम्मान

स्वामी करपात्री जी महाराज का महाप्रयाण 1982 ई. में वाराणसी में हुआ। आज भी उनके अनुयायी उन्हें "धर्म सम्राट" और "यति चक्र चूड़ामणि" की उपाधि से विभूषित करते हैं। उनके विचार और ग्रंथ सनातन धर्मावलंबियों के लिए पथप्रदर्शक हैं।

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